रोज़े....रमज़ान के अलावा!!
रमज़ान के फ़र्ज़ रोज़े तोह हम सब रखते ही हैं, लेकिन कुछ और भी रोज़े हैं जो हमें रखने चाहिए क्योंकि वो सुन्नत हैं और उनका सवाब भी बोहुत है।
*अराफ़ात का रोज़ा*
➡️नबी सल्लल्लाहु अलैही ने फ़रमाया," जो शक़्स अराफ़ात का रोज़ा रखेगा उसके पिछले साल और आने वाले साल के सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे।"
【 सही मुस्लिम, वोल्युम 2, हदीथ 2603 】
जो इंसान हज पे ना गया हो, वो यह रोज़ा रखे, क्योंकि हज में यह रोज़ा नहीं रखते हैं। इस दिन 9 धूल हिज्जा को अल्लाह तआला पहले आसमान पे आता है और अपने बंदों की दुआएं क़ुबूल करता है।
*आशूरा का रोज़ा*
➡️(ऊपर दी हुई हदीथ का दूसरा हिस्सा)
"और जो शक़्स 10 मुहर्रम (आशूरा) का रोज़ा रखेगा उसके पिछले साल के गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे।"
【 सही मुस्लिम, वॉल्यूम 2, हदीथ 2603 】
हम 10 मुहर्रम के साथ 9 या 11 का रोज़ा भी इसलिए रखते हैं क्योंकि सिर्फ़ 10 तारीख़ को यहूदी रखते थे रोज़ा। सो 9-10 या 10-11 मुहर्रम रोज़ा रखना चाहिए क्योंकि यह बात भी सही हदीथ से साबित है।
*पीर-जुमेरात का रोज़ा*
➡️नबी सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने फ़रमाया,
" पीर और जुमेरात को फ़रिश्ते हमारे अमाल अल्लाह के सामने पेश करते हैं, इसलिए मैं पसंद करता हूँ के मेरे अमाल रोज़े की हालत में पेश हों "
【 मसनन अहमद, वॉल्यूम 2, हदीथ 8361 】
एक और हदीथ मे आप सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम फ़रमाते हैं कि -
" मैं पीर का रोज़ा रखता हूँ क्योंकि इस दिन मैं पैदा हुआ था और इसी दिन मुझे क़ुरआन भी अता किया गया था "
【 सही मुस्लिम, वॉल्यूम 2, हदीथ 2606 】
इससे एक बात और समझ में आती है कि हमारे जन्मदिन पे रोज़ा रखने से हम एक सुन्नत भी अदा करेंगे।
*शव्वाल के 6 रोज़े*
➡️"जिस शक़्स ने रमज़ान के बाद शव्वाल के महीने में 6 रोज़े रखे तोह समझो जैसे उसने पूरा साल रोज़े रखे हों"
【 सही मुस्लिम, वॉल्यूम 2, हदीथ 2614 】
ये रोज़े हम शव्वाल में कभी भी रख सकते हैं, एक साथ 6 भी रख सकते हैं और एक दो दिन छोड़ के भी रख सकते हैं।
*13,14,15 तारीख़ का रोज़ा*
➡️" जिस शक़्स ने भी महीने मे चाँद के दिनों में 3 रोज़े रखे, समझो उसने जैसे पूरा साल रोज़े रखे "
【 सही अल बुख़ारी, वॉल्यूम 3, हदीथ 1975 】
मतलब 13,14,15 अरबिक महीने की तारीख़ जब चाँद पूरा होता है। तोह हमे कोशिश करनी चाहिए के हम हर अरबिक महीने में यह तीन दिन रोज़े रखें।
इसके अलावा हमारे जो भी रोज़े छूटते हैं रमज़ान में, चाहे किसी भी वजह से छूटे, उनका या तोह हम फ़िदया दें ( एक रोज़े के बदले किसी को दो वक़्त का खाना खिलाना) या बेहतर यही है के हम अपने छूटे हुए रोज़े रखें अगर हमारी जिस्मानी हालत सही है।
इन शा अल्लाह!!