तरावी... कब और कितनी??

 


तरावी या क़याम अल लैल वो ख़ास नमाज़ है जो हम रमज़ान में ईशा नमाज़ के बाद पढ़ते हैं। अक्सर देखने में आता है के तरावी में पूरा क़ुरआन खत्म किया जाता है भले ही कितनी भी जल्दी कैसा ही पढ़ें। और कई लोग रमज़ान में शुरू के 10 दिन, 15 या 20 दिन में ही क़ुरआन के साथ तरावी भी खत्म कर देते हैं। क्या ऐसा करना सही है??


1] *तरावी का मक़सद* - "अबू हुरैरा (र.अ) से रिवायत है के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया के जो कोइ भी ईमान रख के सवाब की नियत से रमज़ान की रातों में नमाज़ पढ़ेगा उसके सारे पिछ्ले गुनाह माफ़ कर दिये जायेंगे" 【सही बुख़ारी, वॉल्यूम 3, बुक 32, हदीथ 226】

➡️मतलब हम अलग से कुछ ज़्यादा इबादत कर सकें फ़र्ज़ नमाज़ों के अलावा और अल्लाह हमारे गुनाह माफ़ करदे। यह नमाज़ पूरे रमज़ान पढ़नी चाहिये, ना के कुछ दिन में पढ़के ख़त्म। तरावी का अरबी ज़बान से मतलब निकाले तोह यह "रौह" शब्द से आया है। जिसका मतलब रुक रुक के या आराम से है। मतलब यह एक्सट्रा इबादत हम कभी भी रात को आराम से पढ़ सकते हैं, इक खट्टा भी या रात के अलग अलग हिस्सों मे।


2] *तरावी कब पढ़ना है* - "हज़रत आयशा (र.अ) से रिवायत है कि आप रसूलुल्लाह (सल्लल्लाह अलैहि व सल्लम) रात के बीच के हिससे में मस्जिद गए और तरावी की नमाज़ पढ़ाई। तीन दिन तक उन्होंने नमाज़ पढ़ाई और चौथे दिन घर में ही पढ़ी जबकि बाक़ी साथी उनका मस्जिद में इंतेज़ार कर रहे थे। अगली सुबह उन्होंने फ़रमाया के मुझे पता था के तुम लोग मस्जिद आये हुए थे पर मैं ने इसलिए नही पढ़ाई नमाज़ के मुझे अंदेशा था के तुम पर यह फ़र्ज़ ना कर दी जाये।" 【सही बुख़ारी, वॉल्यूम 3, बुक 32, हदीथ 229】

➡️मतलब एक तोह तरावी रात में कभी भी पढ़ी जा सकती है, फ़ज्र से पहले तक, ज़रूरी नहीं के ईशा के फ़ौरन बाद ही पढ़े। दूसरा के यह फ़र्ज़ नमाज़ नहीं है, पर सुन्नते मुअक़्क़दा है। तीसरा के तरावी जमात से मस्जिद में या घर में अकेले दोनो तराह से पढ़ सकते हैं।


3] *तरावी में कितनी रकाअत पढ़ें* - "हज़रत आयशा (र.अ) ने बताया कि आप नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने पूरे रमज़ान ग्यारह रकाअत से ज़्यादा रात की नमाज़(तरावी) नहीं पढ़ी। पहले चार रकाअत पढ़ीं, मत पूछो कितनी लम्बी और खूबसूरत रकाअत, फिर से चार रकाअत पढ़ीं, मत पूछो कितनी लंबी और खूबसूरत, फिर आख़िर में तीन वित्र।" 【सही बुख़ारी, वोल्युम 3, बुक 32, हदीथ 230】

➡️मतलब 8 रकाअत तरावी पढ़ना सुन्नत से साबित है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं के 8 से ज़्यादा नहीं पढ़ सकते। वैसे भी हमारे नबी की 8 रकाअत और हमारी 8 रकाअत में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है। ये एक्स्ट्रा इबादत है जो हम रात भर कितनी भी कर सकते हैं। दूसरी बात यह के वित्र ज़रूरी नहीं हम ईशा में ही या तरावी के फौरन बाद पढ़ें, बल्कि तहज्जुद के बाद वित्र पढ़ना बेहतर है, समझें सेहरी के वक़्त से पहले पहले। बल्कि एक हदीथ मे आता है कि हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने दो दो रकाअत कर के भी नमाज़े पढ़ीं और आखरी में वित्र पढ़ी।

लिहाज़ा तरावी में 8, 10, 12, 20 या उस्से ज़्यादा रकाअत तक भी पढ़ सकते हैं।


घर की औरतें भी घर में तरावी पढ़ें, आराम से अपनी सहूलियत के हिसाब से। क़ुरान नहीं तोह उसकी आख़री दस सूरतों से भी तरावी पढ़ सकते हैं। हम याद रखें कि इबादत मे गिनती से ज़्यादा उसकी गुणवता एहमियत रखती है।